पटाखों पर शीर्ष अदालत का फैसला भ्रामक, दक्षिण भारत और छठ को किया गया नजरअंदाज

अभी कुछ दिनों पहले ही देश की शीर्ष अदालत ने दिवाली पर पटाखों को लेकर एक अहम् फैसला सुनाया जो कि काफी चर्चा का भी विषय बना. अगर सीधे तौर पर देखें तो सुप्रीम कोर्ट का इस मामले में दिया गया निर्णय बिलकुल साफ़ नजर आता है लेकिन आपको ये जानना चाहिए कि ये मीडिया में दिख रहे हेडलाइंस से कहीं ज्यादा पेंचीदा है और भ्रम पैदा करने वाला है. सोशल मीडिया में लोगों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा धार्मिक त्योहारों को मनाने की परंपरा में दखल देने वाला करार दिया. आइये जानते हैं कि कोर्ट के इस फैसले में ऐसी क्या बातें हैं जिस से भ्रम और दुविधा का माहौल बन रहा है.

क्या सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु को नजरअंदाज किया?

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में ये साफ़ दिखता है कि देश के कुछ भागों को और उनके त्यौहार मनाने के पारंपरिक तरीकों और समय को नजरअंदाज किया गया है. जस्टिस सीकरी और जस्टिस भूषण बेंच की बेंच ने दिवाली के मौके पर पटाखे उड़ाने के लिए देश भर में रात 8 से 10 बजे तक का समय मुक़र्रर किया है और इस समयावधि के अलावे किसी अन्य समय पर पटाखों के प्रयोग को अदालत की अवमानना मानी जाएगी.

आपको ये जानकार आश्चर्य होगा कि तमिलनाडु में दीवाली (जिसे वहां पर दीपावली कहते हैं) मनाने का रामायण से कोई सम्बन्ध नहीं है जबकि उत्तर भारत में यह पर्व भगवान राम के लंका से वापस अयोध्या लौटने की ख़ुशी में मनाया जाता है. दक्षिण भारत में दीपावली नरक चतुर्दशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध किये जाने की याद में मनाई जाती है. तमिलनाडु में यह पर्व नरक चतुर्दशी के दिन सुबह मनाया जाता है जबकि उत्तर भारत में अमावस्या की रात को.

ऐसे में ये समस्या खड़ी हो गई है कि तमिलनाडु में जब दीपावली का पर्व 6 नवम्बर की सुबह मनाया जायेगा तो पटाखे रात के समय क्यों छोड़े जाएँ? जैसा कि सर्वविदित है हिन्दू धर्म में पर्व-त्योहारों के दिन और समय खगोलीय स्थितियों की गणना के आधार पर तय किये जाते हैं, ऐसे में कोर्ट द्वारा सुबह मनाये जाने वाले पर्व के उत्सव को रात के समय शिफ्ट कर देना कहाँ तक उचित है?

क्या यूपी-बिहार के सबसे बड़े पर्व की अनदेखी हुई?

यूपी-बिहार का सबसे बड़ा महापर्व है छठ जिसे मॉरीशस और अमेरिका तक रहने वाले बिहारी काफी धूम-धाम से मनाते हैं. इसे देश-भर में रहने वाले बिहार के लोग मनाते हैं जिसमे उगते और डूबते सूरज को अर्ध्य दिया जाता है.

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि दीवाली, गुरूपरब और ऐसे सभी त्योहार जिसमे आमतौर पर पटाखों का प्रयोग किया जाता है उन सबकी समयावधि रात 8 से 10 ही होगी. इस से छठ महापर्व मनाने वाले लोग भी पटाखों का प्रयोग नही कर पाएंगे क्योंकि छठ की पूजा सुबह सूर्योदय या शाम सूर्यास्त के समय की जाती है. ऐसे में रात 8 से 10 तक वाली समयावधि का इसमे कोई महत्व नही रह जाता.

क्या प्रचार-प्रसार से कम होगा पटाखों का प्रयोग?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में सरकारों को यह भी निर्देश दिया कि मीडिया के माध्यम से पब्लिक में पटाखों को लेकर एक “जागरूकता अभियान” चलाया जाए जिसमे पटाखों से होने वाले दुष्प्रभावों के बारे में लोगों को अवगत कराया जाए.

ऐसे में ये सवाल भी लाजिमी हो जाता है कि सिगरेट-गुटखे को लेकर जो इतने बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाया गया है उसका क्या निष्कर्ष निकला है? अभी पिछले साल ही हुए एक सर्वे के मुताबिक भारत मे अभी भी 28 प्रतिशत से ज्यादा लोग तम्बाकू का सेवन कर रहे हैं. ऐसा तब है जब गुटखे, सिगरेट इत्यादि के डब्बों पर भयंकर तस्वीरों के साथ इसके दुष्प्रभाव छपे होते हैं.

वैसे तम्बाकू की पटाखों से तुलना करना बेमानी होगी क्योंकि तम्बाकू से हर छह सेकंड में एक भारतीय अपनी जान गंवा देता है वहीं पटाखों से ज्यादा प्रदूषण गाड़ियों से निकले वाले धुएं, फैक्टरियों से निकलने वाले कचरे, कृषि उत्पादों को जलाने इत्यादि से पैदा होता है लेकिन अबतक इसपर ऐसा कोई बड़ा निर्णय नही लिया गया है जैसा कि पटाखों के बारे में हुआ.

कारोबार में घाटे की भरपाई कैसे होगी?

अदालत के फैसले से पटाखा कारोबारियों में भी काफी गम का माहौल हैं क्योंकि बिना कोई वैकल्पिक स्थिति दिए उनके व्यापार को छीन लिया गया है., अचानक दीवाली से 10-15 दिन पहले आये इस फैसले के कारण उनमे काफी उहापोह की स्थिति है. वैसे आपको पता होना चाहिए कि पटाखों के बाजार में जो कम्पनियां शामिल है उसमें से अधिकतर लोकल लेवल पर काम करती है यानी कि किसी MNCs का इनसे कोई लेना देना नही है.

भारत मे पटाखों के कारोबार को कुल बीस हजार करोड़ का मापा गया है. इसमे से आधे मूल्य के पटाखों को बनाने का काम तो अकेले तमिलनाडु के शिवकाशी जिले या उसके आसपास वाले इलाके से ही होता है. ऐसे मे सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद इस असंगठित कारोबार के व्यापार के पूरे पचास प्रतिशत तक गिरने की संभावना है.

पुलिस का रोल क्या होगा?

कोर्ट ने दिवाली के मौके पर “ग्रीन पटाखों” के पयोग का आदेश दिया है और पुलिस को इस बात के ध्यान रखने के आदेश भी दिए हैं. ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या पुलिस के पास ऐसे उपकरण हैं जो पटाखों में ये जांच कर सकें कि कौन से पटाखे “ग्रीन पटाखों” के समूह में आते हैं और उनमें कौन-कौन से रसायन कितनी मात्रा में हैं? असंगठित कारोबार होने के कारण पुलिस के लिए ये एक खासा मुश्किल काम है.

वैसे भी इस तरह के पर्व-त्योहार के मौकों पर आतंकवादी खतरों, चोरी की वारदातों और साम्प्रदायिक टेंशन को देखते हुए पुलिस काफी चौकन्नी रहती है और इनसे निपटना पुलिस की पहली प्राथमिकता होती है. ऐसे में पुलिस पटाखों की जांच करने निकल जाए तो फिर आपराधिक वारदातों को कौन रोकेगा.

कुल मिलाकर देखें तो इस फैसले में इतने सारे पेंच है जो भ्रम पैदा करते हैं. आशा है कोर्ट में आगे की सुनवाइयों में इन बातों का कुछ निदान निकलेगा लेकिन फिलहाल जल्दबाज़ी में दिए गए इस फैसले ने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है

.

A lethal dominance that once ruled the screen

This day marks the birth anniversary of an actor who once redefined the screen presence with his striking voice, fearsome looks & intense eyes. India better knows him as the over-ambitious Mogambo in 1987 movie Mr.India & the world knows him for his character of priest (tantrik) Molaram in legendary Steven Spielberg’s hollywood movie “Indiana jones and the temple of doom (1984)”.

Amrish is my favourite villain. The best the world has ever produced and ever will!”

Steven Spielberg (Highest grossing director in the world).

An ambitious Pakistani politician in most watched movie of the Indian cinema “Gadar-Ek Prem Katha (2001)” is still as famous as Tara Singh. He was in the character, he didn’t act but just lived that character.

Yeah. He is the Sapera of Main naagin tu sapera. You must have encountered that serpent-charmer of “Nagina (1986)” with long hairs playing harp continuously.

Be it outshining four powerful villains (Pran, Prem Chopra, Danny & Madan puri) of that era in Andha Kanoon (1983) or music lover cruel man in Jackie Shroff’s famous debut movie “Hero (1983)”, even the lead actors struggled to mark their space while sharing screen with him.

“Shahenshah (1988)” was Bachchan’s comeback movie famous for his attire & specially the dialogue “Rishtey mein to hum tumhare baap hote hain, naam hai Shahenshah” but don’t forget the Amrish Puri’s entry scene in which he emerges from a swiming pool & explains the definition of Kanoon to his people. And what about the dialogue which prompted the spike in the sell of Black dog wine;

“Jab bhi gori titliyan dekhta hu na thakur..toh mere man mein hazaron kaale kutte bhonkne lagte hain aur tab main black dog pita hu.”

Who can forget the powerful Balwant Rai of “Ghayal (1990)” & Bhisambhar Nath of “Ram Lakhan (1989)”. Such was the ascendancy of his powerful personality that multi-starers were made just to tackle the juggernaut character played by him. Some of them are:

  • Andha Kanoon (1983)” staring Bachchan & Rajini.
  • Asli Naqli (1986) staring Shatrughan Sinha & Rajinikanth.
  • Tridev (1989) staring Naseeruddin Shah, Sunny deol & Jackie Shroff.
  • Maidan-E-Jung staring Dharmendra, Manoj Kumar & Akshay Kunar
  • Tahalka (1992) staring Dharmendra, Naseeruddin Shah & Aditya Pancholi.
  • Karan Arjun (1995) staring SRK & Salman Khan

Tahalka is widely famous for his look & specially the song Shom shom shom” that he keeps reciting in the movie.

Bt remembering Amrish Puri only for his villainous characters will be injustice to his versatility & the theatre background from where he came. For example, An aggressive but caring father and jamindar in “Virasat (1997)”, a man of principles in “DDLJ (1995)”, a helpless father &, x-freedom fighter with ‘Tamrapatra” in “Ghatak (1996)”- These close to reality roles played by him defines his versatility.

When it comes to comic timing, he was as good as any other seasoned comedian. Watching him in “Mujhse Shaadi Karogi (2004)” & “Chachi 420 (1997)” still makes us laugh.

Last but not the least, this article will remain incomplete without mentioning the politician of the reality-check political drama “Nayak (2001)” which finds significance even in the modern days. The epic interview scene still gives goosebumps.

प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय: इतिहास के पन्नों से

बिहार का प्राचीन नालन्दा विश्वविद्यालय कभी पूरे भारत की शान हुआ करता था. 14 हेक्टेयर में फैले इस ज्ञान के महासागर के अंदर शिक्षा का ऐसा दीप प्रज्ज्वलित था जिसके प्रकाश में भारत और पड़ोसी देश ही नही बल्कि यूनान, चीन, रूस और पर्शिया तक के छात्र अध्ययन किया करते थे. आज जहाँ स्कूलों में छात्र-शिक्षक ratio की बात होती है तो ये याद करने लायक है कि नालन्दा विश्वविद्यालय में 10 हजार छात्रों पे 2 हजार शिक्षक थे. कैंपस के अंदर कई तरह की इमारतें थी जो अलग-अलग देशों के राजाओं के दान से बनाई गई थी. इंडोनेशिया के राजा द्वारा बनवाए गए ढांचे का भी प्रमाण मिलता है. शिक्षा के इस महान धरोहर की सबसे बड़ी खासियत थी इसकी library जो कि 90 लाख किताबों का घर हुआ करती थी. जी हाँ, नब्बे लाख. कहते हैं बख्तियार खिलजी ने जब इस library को आग के हवाले किया था तो 3 महीने तक इसमे पड़ी किताबें जलती रही थी.

बख्तियार खिलजी के इस आक्रमण के पीछे की कहानी भी दिलचस्प है. उसे एक ऐसा रोग हो गया था जिसे ठीक करने के लिए बड़े-बड़े चिकित्सक लगाए गए लेकिन सबने हार मान ली. अंत मे एक बौद्ध भिक्षु ने आयुर्वेद की मदद से उसका सफल इलाज किया और यही बात उसे चुभ गई. उसने भारत की महान परम्पराओं के स्रोत को ही मिटाने की ठान ली क्योंकि वो इस बात से हतप्रभ था कि यहाँ के लोग बौद्धिक रूप से इतने सम्पन्न हैं. नालन्दा की library तीन बड़े इमारतों में फैली हुई थी जिसमे एक नौ मंजिले इमारत में सबसे पवित्र पुस्तकें रखी हुई थी. आक्रमण के समय कई हिंदुओं खासकर ब्राह्मणों को मार डाला गया था और कुछ को तो जिंदा ही जला दिया गया था.

तिब्बत के एक लेखक ने जब नालन्दा की बर्बादी के 42 सालों बाद सन 1235 में यहाँ का दौरा किया तो देखा कि तबाही के भयानक मंजर की याद दिलाते खंडहर में एक बूढ़े शिक्षक राहुल श्रीभद्र 70 छात्रों की एक कक्षा चला रहे थे.

गणित, खगोल, आयुर्वेद, योग और अर्थ सहित तमाम विषयों की जानकारी इसके साथ ही लुप्त होती चली गई. आज माहौल अनुरूप है और समय अनुकूल है कि हम फिर से इतिहास के गर्भ में छिपे बेशकीमती चीजों को ढूंढे और उसका लाभ पूरे विश्व को मिले. क्या बिहार का पुराना गौरव वापस आ पाएगा?

Source: My India My Glory with thanks to Rayvikumar Pillay

राजकुर शुक्ल : चम्पारण सत्याग्रह के सूत्रधार

#MyPiece

आज से ठीक 100 साल पहले 1917 के इसी महीने के इसी हफ्ते में अपने शहर मोतिहारी के स्टेशन पर वो शख्स उतरा था जिसके बारे में सवतंत्रता सेनानी कवि सोहनलाल द्विवेदी ने “चल पड़े जिधर दो डग, मग में चल पड़े कोटि पग उसी ओर” लिखा था. जैसा कि गांधीजी ने अनुभव किया, उस जमाने मे चम्पारण में हांथी का उपयोग उतना ही सामान्य था जितना कि गुजरात मे बैलगाड़ी का. इस बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है और सैंकड़ों शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन आज हम बात करते हैं अपने जिले चम्पारण के उस लाल की जिसने यहां के किसानों की दुर्दशा से गांधीजी अवगत कराया. क्योंकि गांधीजी के यहां आकर किसानों के उद्धार करने की कहानी तो सबको पता है ही लेकिन हम ये नही जानते कि उनको यहां लाने में किनका योगदान था और अगर जानते भी हैं तो ये नही जानते कि गांधीजी को यहां लानेवाले ने कितना संघर्ष कर के उनका ध्यान चम्पारण की तरफ खीचने में कामयाबी पाई थी. ऐसा नही है कि पांच एकड़ जमीन जोतने वाले राजकुमार शुक्ल सबसे पहले गांधी के पास ही मदद के लिए पहुंचे थे बल्कि उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं जैसे कि तिलक और मालवीय जी से मिलकर भी यहां के कृषकों के जमींदारों और अंग्रेजों सरकारों के द्वारा प्रताड़ना की व्यथा सुनाई थी. जो भी कारण रहे हों लेकिन किसी ने इस समस्या को उतना गम्भीर नही माना और अंततः कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में यहां के नीलहे किसानों के प्रति संवेदना जताते हुए एक प्रस्ताव पारित कर के इतिश्री कर ली गई. उसी प्रस्ताव पर बोलते हुए राजकुमार शुक्ला ने कहा “मुझे खुद नही पता है कि यहां आकर आपलोगों को अपनी व्यथा सुनाने के लिए चम्पारण लौटने पर मेरे साथ क्या किया जाएगा”. यही वो अधिवेशन था जहां शुक्ल जी की मुलाकात मोहनदास करमचंद गांधी से हुई जिन्होंने इस मुद्दे पर ये कहकर चुप्पी साध ली थी कि चूंकि वो इस विषय मे ज्यादा कुछ जानते नही हैं इसलिए इस प्रस्ताव पर कुछ नही बोल सकते. लेकिन राजकुमार जी ने प्रसिद्ध पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी से गांधीजी के अफ्रीका में किये गए संघर्ष और उसकी सफलता की कहानी सुन रखी थी और वो उनसे खासे प्रभावित थे.

राजकुमार शुक्ल भी हार माननेवालों में से नही थे. अगर वो लखनऊ से सीधा चम्पारण लौट कर बैठ गए होते तो शायद आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता लेकिन उन्होंने गांधी के अगले पड़ाव कानपुर तक उनका पीछा करना सही समझा. राजकुमार जी ने गांधीजी से ये कहकर फिर विनती की कि चम्पारण कानपुर से नजदीक ही है लेकिन गांधी ने व्यस्तता का हवाले देकर उनके अनुरोध को फिर से नकार दिया. महात्मा गांधी वहां से अहमदाबाद अपने आश्रम के लिए निकल गए लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने जो देखा वो काफी चकित करने वाला था. गांधीजी के शब्दों में कहें तो “सर्वव्यापी” शुक्ल वहां भी मौजूद थे. आखिरकार गांधीजी ने उन्हें अपने कोलकाता के प्रोग्राम की तारीख बतायी और और वहां आकर उनसे मिलने को कहा. गांधीजी जब कोलकाता पहुंचे तो उन्हें ये जानकर और भी सुखद आश्चर्य हुआ कि राजकुमार जी ने वहां पहले से ही खुद को स्थापित कर रखा था. यही नही, जिन भूपेन बाबू के यहां गांधीजी रुकने वाले थे उनसे भी उन्होंने भी उन्होंने अच्छी जान-पहचान बना ली थी. फिर इन्ही राजकुमार शुक्ल जी ने पटना के लिए टिकट का भी इंतजाम किया वरना गांधीजी को तो ट्रेन का नाम तक नही पता था और उन्होंने सबकुछ शुक्ल जी पर ही छोड़ रखा था. हाँ टिकट जरूर उनके कहे अनुसार तीसरे दर्जे का ही कटाया गया था. वहां से उनलोगों का पटना, फिर मुज़फ़्फ़रपुर में कुछ दिनों का विश्राम  करते हुए मोतिहारी पहुंचना हुआ. इसी चम्पारण सत्याग्रह की वजह से गांधीजी के कुछ आजीवन मित्र बने जैसे कि वकील द्वय डॉ राजेन्द्र प्रसाद और ब्रजकिशोर प्रसाद.
बिहार में निलहे जमींदारों की मनमानी और अंग्रेजों की क्रूरता के अलावे छुआछूत और जात-पात की समस्या ने भी गांधीजी को भीतर तक विचलित कर दिया था. गांधीजी के मोतिहारी पहुंचने और आंदोलन की कहानी तो हमने इतिहास में पढ़ ही है और सर्वविदित है. रह जाता है तो राजकुमार शुक्ल का संघर्ष जिन्होंने लखनऊ से कानपुर से अहमदाबाद से कोलकाता से मोतिहारी तक पूरी जी-जान लगाकर गांधीजी को यहां लाने की कोशिश की और कामयाब हुए. आज यही बिहार है, वही मोतिहारी है और देश के कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह Radha Mohan Singh भी यहीं से हैं और गांधीजी ने जिनके लिए कभी संघर्ष किया, आज वो किसान भी वहीं का वहीं है. बहुत कुछ किया गया है उन किसानों के लिए सरकार द्वारा लेकिन धरातल पर स्थिति वहीं की वहीं है और वो आज भी कर्ज लेकर खेती करने को मजबूर है.

#SatyagrahShatabdiVarsh

A wonder that’s Akshay Kumar

Mypiece

“We all have been stagnant, he is the only one, who keeps on growing and growing and growing.”-This is the statement of none other than Salman Khan at 2.0 poster launch event in Mumbai. Yes he was talking about Akshay Kumar who has got his 1st National Award today for his enthralling show in Rustom. “He is one of the most hardworking and dedicated actors that we have.” Mr. Khan didn’t hesitate to avow. Though Akshay won the filmfare twice but noteworthily, not in the “best actor” category.

New poster of Akshay Kumar from 2.o

From Abbas-Mustan’s lead actor in their superhit thrillers “Khiladi”, “Ajnabee” & “Aitraaz” to Neeraj Pandey’s refreshing comedy “Special 26” & trendsetter “Baby”, a career spanning 26 years says a lot about him. The man can make you laugh with his comic timing in “Hera Pheri” series, “Housefull” series, “Garam Masala”, “Namastey London”, “Singh is King”, “Entertainment” “etc and the same man has the ability to leave you spellbound by his action sequences in “Khiladi” series, “Sangharsh”, “Chandani Chowk to China”, “Saugandh” & “Mohra”. Opportunity & Space that the supporting cast gets to perform gives distinct flavour to his movies. Be it Kumud Mishra in Rustom, Anupam Kher, Rana Daggubati & Kay Kay Menon in “Baby”, Inaamulhaq, Kumud & Prakash Belawadi in Airlift, Johnny Lever,Sonu Sood & Prakash Raj in “Entertainment” or Sumeet Raghavan in Holiday- The co-actors get their share of moments, something that’s as scarce as hen’s teeth in most big hero movies. He is endowed with time & money saving attitude in movie-making which paves the way for a controlled-budget movie that takes less than even two months to be completed.
He doesn’t scruple to share his views about social issues. In one of his videos he profoundly advices his fans to avail themselves of Ayurveda where as in another one he looks condemning brazen mass molesters of Bangalore. He happens to be an A-lister hero who doesn’t hesitate sharing screen with other juggernauts of the film industry unlike other established actors whose egoistic attitude stops them to do so. Be it Salman Khan in “Mujhse Shadi Karogi”, Ajay Devgn in “Suhaag”,Anil S Kapoor & Nana Patekar in “Welcome”, Shah Rukh Khan in “Dil to pagal hai”, Ajay Devgn & Amitabh Bachchan in “Khakee”, Akkineni Nagarjuna in “Angaaray” & numerous movies with Suniel V Shetty & Saif Ali Khan each. He never refuse to play small roles in others’ movies when he finds the theme worthy of encouragement, Paresh Rawal’s “OMG! Oh My God” & Vinay Pathak’s “Chalo Dilli” being the notable ones.
Even after being a Canadian citizen, he is solicitous about welfare of the nation because he has acquired a better grasp of issues related to our national interest & patriotism than his contemporaries. Notwithstanding he is a very good actor; he is a true representative of the real intellectual society of our country. Today he has attained something that even Khan trio has failed to achieve. Nowadays when he has again switched the gear and doing sensitive movies to promote social causes, let’s join to congratulate him for his #NationalAward.

#CongratulationsAkshayKumar

रामायण : इतिहास से जुड़ा एक भूगोल

#MyPiece

इसमे कोई दो मत नही कि रामायण हमारा इतिहास है लेकिन आज समय आ गया है कि हम अब इस इतिहास से जुड़े भूगोल पर भी जरा ध्यान दें. राम ने आखिर अयोध्या से श्रीलंका तक पैदल सफर कैसे तय किया और भारत के नक्शे पर हम इसे कैसे देख सकते हैं. जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या से वनवास के लिए निकले तो इन्होंने त्रिवेणी (गंगा, यमुना और सरस्वती) को पार कर प्रयाग नगरी में प्रवेश किया जिसे आज इलाहाबाद के नाम से जाना जाता है. उत्तर प्रदेश में ही चित्रकूट वो जगह है जहां भरत राम से मिलने पहुंचे थे और “भरत मिलाप मन्दिर” वो स्थल है जहां भरत ने राम से वापस लौटने का आग्रह किया था. यहां से आगे बढ़कर राम ने पंचवटी में आश्रम बनाया. दण्डकारण्य का रामायण में बार बार जिक्र आता है जहां उनका सामना कई राक्षसी ताकतों से हुआ था. भारतीय उपमहाद्वीप की पांचवी सबसे लम्बी नदी और मध्य प्रदेश की जीवन-रेखा नर्मदा और भारतवर्ष की दूसरी सबसे लम्बी नदी, पूरे महाराष्ट्र को सींचने वाली गोदावरी – इन दोनों महान नदियों के बीच बसा जंगल था- दण्डकारण्य. नर्मदा नदी को ही उत्तर और दक्षिण भारत के बीच की सीमा-रेखा होने का गौरव प्राप्त है. महाराष्ट्र के नासिक स्थित पंचवटी से ही सीता-हरण होता है और राम लक्ष्मण के साथ उनकी खोज में निकलते हैं. आंध्र प्रदेश के अनन्तपुर जिले में लिपाक्षी वो जगह है जहां घायल जटायु का राम से मिलन हुआ और जटायु के निधन के बाद श्रीराम ने उनका क्रिया-कर्म यहीं पे किया.

अब रामायण के सबसे महत्वपूर्ण पात्र हनुमान अपने आराध्य से मिलते हैं और जिक्र आता है किष्किंधा नगरी का. किष्किंधा तुंगभद्रा नदी के किनारे स्थित नगर था जो कर्नाटक के कोप्पल जिले में हम्पी के नजदीक है. हम्पी अपने आप में एक बहुत बड़ा नाम है और भारत के इतिहास का एक बहुत बड़ा और अति महत्वपूर्ण पन्ना है- इसका विस्तृत जिक्र बाद में. किष्किंधा और पंचवटी- ये सब विशाल दण्डकारण्य के ही अंदर आते थे जो उत्तर में विंध्य से लेकर दक्षिण के प्रायद्वीपों तक फैला हुआ था. रामेश्वरम से आप सब परिचित हैं ही.

इसे हमारा दुर्भाग्य कहें या सत्य से आंखे मूंद लेना कि भारत मे राम की जन्मभूमि अयोध्या और भारत-श्रीलंका के बीच वानर सेना द्वारा तैयार किया गया रामसेतु – दुर्भाग्यवश दोनों ही अदालतों, नेताओं और मीडिया के बीच बिना सिर-पैर की बहस का मुद्दा बने हुए हैं.

इसे पर्यटकों को आकर्षित करने का प्रयास कहिये या इतिहास के प्रति संजीदगी लेकिन श्रीलंका सरकार इस मामले में हमसे बहुत आगे है और उन्होंने रामायण से जुड़ी हर एक जगह को सहेज के रखने का पूरा प्रयत्न किया है. श्रीलंका के पांच वनस्पति उद्यानों में से एक- “Hakgala Botanical Garden” वो जगह है जो कभी अशोक वाटिका हुआ करता था. कोलम्बो और कटरागामा के बीच स्थित और प्रकृतिक सुंदरता का जीता-जागता प्रमाण हैं उसानगोडा जहां की मिट्टी आज भी काली है. जानकारों के अलग अलग अपुष्ट दावे हैं लेकिन लंका-दहन के बाद बचे हुए राख को इसका कारण माना जाता है. ये जगह अपने चारों तरफ घिरे जगहों से वातावरण और व्यवहार में बिल्कुल ही अलग है. तलाईमन्नार वो जगह है जहां राम-सेतु से उतरने के बाद राम ने श्रीलंका में अपना पहला कदम रखा था. आज वहां का समुद्र-तट और बीच आकर्षण के केंद्र हैं.

तो भाई कुल मिलाकर बात ये है कि इतिहास आपके सामने है और भूगोल तो मुँह बाये ही खड़ा है तब भी अगर आप अंधे-बहरे बन कर बैठे हुए हैं तो या तो आप वामपंथी हैं या आपका दिमाग खराब है. किसी-किसी case में दोनों बातें हो सकती है.

#HappyRamNavami

The forgotten achievements of a hero

The plight of Dalit communities of India nowadays is nothing but the serious ramification of emergence of the unscrupulous politicians like Mayawati and other pro-executants of the appeasement politics. Amidst all the unnecessary shrill being produced by these self-proclaimed representatives of these communities what we actually forget is to have a look at the real Dalit leaders and their countless endeavours to eradicate the real obstacles interrupting the growth of Dalits.

One name that shines intensely is of none other than Babu Jagjivan Ram. The history of Indo-Pak war of 1971 that prompted the creation of a new nation named Bangladesh is long touted in a ridiculous way only trumpeting the administrative abilities of then PM Indiira Gandhi. Before proceeding further let us remind ourselves that Jagjivan Ram was at that time the defence minister of India who according to an official statement of Bangladesh, “had an  excellent grasp of military strategies” and “was an able administrator”. “It was Jagjivan Ram who made sure that the requirements of the three Services: manpower, weaponry equipment and infrastructural facilities- were provided, as far as possible.” The same bulletin reads.

Describing him as a war hero who was instrumental in the 1971 liberation war against Pakistan, Bangladesh govt honoured him in Oct 2012.

Again in 2014, he was awarded prestigious ‘Friend of Bangladesh’ award.

As we cite a prominent historian of Bangladesh Quazi Sajjad Ali Zahir :

“Babu Jagjivan Ram’s role was fascinating.  He used to visit training camps set up for Mukti Bahini fighters in Northeast India. He was solely responsible for co-ordinating between the then Prime Minister’s Office, Home Minister and the Defence Forces.”- he wrote.(Source-newsminute)
It was Babu Jagjivan Ram who pronounced before the war that Pak won’t be allowed to seize even a single inch of the sacred land of India & India is not going to return what we seize from the Pak. Sadly “Shimla Agreement” came in his way of fulfilling  the second promise but still his role was much bigger than that of Indira Gandhi (Among Politicians since I am not talking about our brave Jawans who fought in the war).Last but not the least, he was the one who started many schemes for welfare of the families of those who fought in the war. The onus was on Congress Party & Dalit leaders to recognise his works but it is misfortune of the Dalit community that his own party is responsible for obliterating his memories.

#HappyBirthdayJagjivanRam

वीर शिवाजी की एक कहानी

#MyPiece

ये किस्सा लगभग 400 बरस पुराना है जब बीजापुर के शक्तिशाली सल्तनत के तेजतर्रार सेनापति अफ़जल खान ने मराठा साम्राज्य के उदयीमान सूर्य को सबक सिखाने की पूरी तैयारी कर ली थी. अफ़जल नाम से संशय नही होना चाहिए क्योंकि ये वो वाला अफ़ज़ल नही है जिसने भारत के लोकतंत्र के सबसे बड़े मन्दिर को खून से नहलाने की कोशिश की थी लेकिन हां, लक्ष्य और विचार दोनों के एक ही प्रतीत होते हैं. जी हां तो अफ़ज़ल खान वो रणनीतिकार और योद्धा था जिसने कम समय मे ही खुद को अपनी युद्ध क्षमता और नेतृत्व शक्ति के कारण बीजापुर का एक अहम किरदार बना रखा था. और खास बात ये थी कि वो अपने हरेक अभियान पर जाने से पहले एक सूफी पीर का आशीर्वाद लेने जाया करता था लेकिन इस बार कुछ अजीब बात हो गई. इस सिलसिले को जारी रखते हुए जब उसने अपने मराठा अभियान से पहले सूफी पीर का आशीर्वाद लेना चाहा तो पीर ने इसे उसका अंतिम युद्ध करार दिया. इस से खास फर्क पड़ा नही क्योंकि कभी सिकन्दर को भी अरस्तु ने सिंधु पार करने से रोका था. इसे दम्भ कहें या खुद पर अत्यधिक आत्मविश्वास लेकिन चिंतकों को वीरों ने हमेशा ही नकार दिया है. इसलिए अफजल खान को भी आगे बढ़ना था और वो बढा. हांथी, घोड़ों, ऊंट और तरह तरह के हथियारों से सुसज्जित दस हजार तेजतर्रार सौनिकों के एक भीषण दल के नेतृत्वकर्ता ने मराठा क्षेत्र में तहलका मचा डाला. तुलजापुर (उस्मानाबाद) का भवानी मन्दिर जो कि 51 शक्तिपीठों में से एक है, उसे तहस नहस कर दिया गया और देवी की प्रतिमा उखाड़ फेंकी गई. पंढरपुर के विट्ठल मन्दिर को भारी नुकसान पहुचाया गया. अफ़जल खान के ये सब करने का एक बड़ा कारण था. कारण ये था कि शिवाजी मिल नही रहे थे.

A painting from 1920 depicting the Shivaji mortally wounding Afjal Khan.

शिवाजी ने बिना कोई सीधा युद्ध किये बीजापुर सल्तनत की नाक में दम कर रखा था. उन्होंने अपने सिपाहियों के साथ गुरिल्ला युद्ध की रणनीति बनाई थी जिसमे वो घने जंगलों, पहाड़ों और गुफाओं में छिपे रहते और असावधान दुश्मन पर अचानक धावा बोलकर उसे असहज कर चित कर देते. अबकी भी वो घने दुर्गम जंगलों से घिरे प्रतापगढ़ के किले में डेरा जमाए हुए थे. चालाक अफ़ज़ल खान जनता था कि वहां पहुंचकर आक्रमण करना उसके वश की बात नही थी और उस से भी ज्यादा चालक शिवाजी भी जानते थे कि मैदानों में निकलकर इतनी विशाल सेना का सामना करने का मतलब था कि बिना लड़े आत्मसमर्पण करना. यही कारण था कि हिंदुओं के धार्मिक आस्था के प्रतीकों को निशाना बनाया गया. अंततः धूर्त अफ़जल खान ने कृष्णाजी जो कि एक एक पुजारी थे, के द्वारा सन्धि प्रस्ताव भिजवाया. 
आदिलशाही को चुनौती तो दे दी थी और एक स्थापित मुस्लिम सम्राज्य के लिए वो खतरा बन कर भी उभर रहे थे लेकिन अब तक उन्होंने कोई बड़ा युद्ध नही लड़ा था. शायद ये उनके साथ दे रहे लोगों की समझदारी कहें या अनुभव की कमी कि उन्होंने शिवाजी को आदिलशाह से समझौता करने की सलाह दी.
दिमाग के महाधनी शिवाजी ने कृष्णाजी को हिन्दू धर्म की सौगंध देकर अपने दुश्मन के असली इरादों की भनक लेनी चाही और काफी हद तक वो सफल भी हुए. एक सधी रणनीति के तहत भावी विशाल मराठा साम्राज्य के छत्रपति ने पँतजी को विरोधी खेमे में सन्धि प्रस्ताव की स्वीकृति लेकर भेजा जहां उन्होंने कुछ विरोधी खेमे के लोगों को घूस देकर अहम जानकारियां जुटाई. खैर प्रतापगढ़ के नीचे एक पहाड़ी को दोनों के मिलने का स्थान तय किया गया. शिवाजी को दुश्मन का इतिहास पता था. वो जानते थे कि इसी अफ़जल खान ने राजा कस्तूरी रँगा को सन्धि प्रस्ताव के बहाने बुलाकर धोखे से मार डाला था. इसलये उन्होंने विरोधी द्वारा प्रस्तावित बैठक स्थल को साफ नकार दिया था.
तो आइए अब देखें कि दोनों की ये बैठक कैसी रही. सहमति ये बनी की दोनों नेता निःशस्त्र रहेंगे और उनके साथ एक सलाहकार और दो अंगरक्षक रहेंगे. एक अंगरक्षक तलवार तो एक धनुष बाण से लैस होगा. लेकिन शिवाजी ने दुश्मन के इरादों को भांपते हुए सादे वेश में जगह जगह पर अपने कुशल सैनिकों की तैनाती कर रखी थी और उनलोगों को विरोधियों की हरकतों पर पैनी नजर रखने के निर्देश दिए गए थे. खुद सतर्क शिवाजी ने सुरक्षा के तौर पर कपड़ों के नीचे लौह कवच और पगड़ी के नीचे स्टील का “हेलमेट” पहन रखा था. हांथों में बाघनख पहने और बिछवा छिपाए (एक प्रकार का चाकूँ जैसा जैसा हथियार) शिवाजी ने दुश्मनों को भरपूर चकमा दिया. यहां थोड़ी अफ़जल खान की शारीरिक बनावट की भी बात कर लें क्योंकि ये जरूरी है. वो काफी लंबा, चौड़ा, हष्ट-पुष्ट और एक मजबूत अफगान था. एक बार युद्ध के बीच मे उसकी तोप कींचड़ में फस गई जिसे उसके आठ सैनिक मिलकर भी न निकाल सके थे उसे उसने एक हाँथ की ताकत से खींच लिया था. उसके ताकत की एक बानगी हम आगे भी देखेंगे.
तय समय पर नियमानुसार दोनों दल पहुंचे और अफ़ज़ल खान ने शिवाजी को औपचारिक रूप से गले लगाया. लेकिन ये क्या ? उसकी पकड़ शिवाजी पर और कसती चली जा रही थी. वो शिवाजी की गर्दन पकड़ कर ऊपर उठाने लगा. उससे कद और शरीर मे छोटे शिवाजी की सांसें फूलने लगी और वो बेहोश की अवस्था मे जाने ही वाले थे लेकिन उनके कवच के कारण उन्हें सम्भलने का मौका मिला. अब प्रतिक्रिया की बारी थी और वो भी स्फूर्ति और तेजी के साथ एक सधी हुई प्रतिक्रिया. शिवाजी ने उस अवस्था मे भी अचानक से पलट कर बघनखे से उसकी छाती चीर डाली और बिछुए से एक जबरदस्त वार किया. अपने मालिक को तड़पता देख उसके अंगरक्षक सैयद बन्दा ने शिवजी की पगड़ी पर जबरदस्त वार किया लेकिन उनके जीवनरक्षक बन कर सामने आए उनके अंगरक्षक जीवा महाला जिनका नाम आज भी काफी आदर के साथ लिया जाता है. जीवा ने सैयद की दायीं हाँथ को काट डाला और उसे 72 हूरों के पास पहुँचा दिया. घायल अफ़जल खान के सैनिकों ने उसे पालकी में बिठाकर अपने दल की ओर ले जाने की कोशिश की लेकिन ऐन वक्त पर सम्भाजी कविजी जी ने हमला कर उसे मार डाला. इस तरह बीजापुर सल्तनत के सेनापति का अंत हो गया जिसने आदिलशाही से मुगल साम्राज्य तक को हिला डाला.

शिवाजी यहीं नही रुके बल्कि उन्होंने प्रतापगढ़ पहुंच कर अफ़जल के बाकी सैनिकों पर अचानक हमला करने का निर्देश दिया. इस तरह से प्रतापगढ़ के इस युद्ध मे शिवाजी को भारी विजय मिली.

#HappyBirthdayShivaji #Shivaji

स्वीकार्यता के नये मानदंड – I

आइए आज हम एक नजर उन Top-5 लोगों पर डालते हैं जो हमारे देश की secular मीडिया को स्वीकार्य हैं –

  1. लालू यादव – लालू कुछ भी बोलें तो उसे एक humour की तरह हांथोहाथ लिया जाता है और वो एक हास्यकवि की तरह पूजे जाते हैं. वो अधिकारियों को चप्पल से मारने की धमकी दे सकते हैं और सार्वजनिक रूप से गालियां भी बकते रहते हैं. उनसे चुनाव के समय चारा घोटाले को लेकर सवाल नही पूछे जाते. बावजूद इसके कि देश की न्यायपालिका ने उन्हें चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया हो, वो स्वीकार्य हैं.
  2. मुलायम सिंह यादव – मुलायम रामभक्तों पर गोली चलवा कर उनकी जान ले सकते हैं लेकिन उनसे इस मसले पर तीखे सवाल नही पूछे जा सकते हैं. कारण ये है क़ि नक्सली तो हमारे देश के अपने लोग हैं और कश्मीर में सेना के जवानों को पत्थर चलाकर घायल करनेवाले stone pelters तो हमारे रिश्तेदार ही हैं लेकिन क्या मजाल कि आप राम मंदिर के लिए आंदोलन करें.
  3. मायावती – आप हिन्दू एकता की बात नही कर सकते क्योंकि इस से माहौल खराब होता है और आप दंगे भड़काने के आरोपी कहलाएंगे लेकिन हाँ अगर आप मुस्लिम एकता या दलित-मुस्लिम एकता की बात करते हैं तो आप मायावती की तरह social engineer कहलाएंगे. वो जगह जगह करोड़ों की लागत से अपनी मूर्तियां लगवाती हैं, उनके जन्मदिन पर आम जनता से जबर्दस्ती चंदे वसूले जाते हैं और उच्चाधिकारी उनके जूते पर लगी गन्दगी साफ़ करते हैं. लेकिन उनसे क्या मजाल की कोई पत्रकार इन सब पर सवाल पूछ दे और हाँ वो भी एक सर्व स्वीकार्य नेता हैं.
  4. फारुख एवं उमर अब्दुल्ला – फारुख अब्दुल्ला अलगाववादियों का समर्थन करते हैं और उनके बेटे उमर अफजल गुरु को फांसी दिए जाने का कड़ा विरोध करते हैं लेकिन मीडिया को अब्दुल्ला परिवार से कोई समस्या नही है. फारुख भारतीय हैं और उन्हें हमसे ये पूछने का भी पूरा हक है कि क्या POK तम्हारे बाप का है और उमर भारत में हुए आतंकी हमलों को लेकर पाकिस्तान को clean-chit दे सकते हैं लेकिन मीडिया को दिक्कत केवल पाकिस्तान और आतंकवाद के विरोधियों से ही है.
  5. असदुद्दीन ओवैसी – .हमारे देश का secular मीडिया किसी को भी अपने आप को हिंदुओं का नेता कहने की इजाजत नही देता लेकिन ओवैसी minority की आवाज माने जाते हैं. न कही उनकी सरकार है और ना ही हैदराबाद से बाहर उनकी उपस्थिति फिर भी वो नियमित अंतराल पर अलग अलग debates और shows में मुस्लिमों के वकील के तौर पर invite किये जाते रहे हैं. वो भारत माता की जय बोलने से साफ़ मना करते हैं और कहीं भी उनसे उनके भाई अकबरुद्दीन ओवैसी के कारनामों के बारे में सवाल नही पूछे जाते.