राजकुर शुक्ल : चम्पारण सत्याग्रह के सूत्रधार

#MyPiece

आज से ठीक 100 साल पहले 1917 के इसी महीने के इसी हफ्ते में अपने शहर मोतिहारी के स्टेशन पर वो शख्स उतरा था जिसके बारे में सवतंत्रता सेनानी कवि सोहनलाल द्विवेदी ने “चल पड़े जिधर दो डग, मग में चल पड़े कोटि पग उसी ओर” लिखा था. जैसा कि गांधीजी ने अनुभव किया, उस जमाने मे चम्पारण में हांथी का उपयोग उतना ही सामान्य था जितना कि गुजरात मे बैलगाड़ी का. इस बारे में बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है और सैंकड़ों शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं लेकिन आज हम बात करते हैं अपने जिले चम्पारण के उस लाल की जिसने यहां के किसानों की दुर्दशा से गांधीजी अवगत कराया. क्योंकि गांधीजी के यहां आकर किसानों के उद्धार करने की कहानी तो सबको पता है ही लेकिन हम ये नही जानते कि उनको यहां लाने में किनका योगदान था और अगर जानते भी हैं तो ये नही जानते कि गांधीजी को यहां लानेवाले ने कितना संघर्ष कर के उनका ध्यान चम्पारण की तरफ खीचने में कामयाबी पाई थी. ऐसा नही है कि पांच एकड़ जमीन जोतने वाले राजकुमार शुक्ल सबसे पहले गांधी के पास ही मदद के लिए पहुंचे थे बल्कि उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेताओं जैसे कि तिलक और मालवीय जी से मिलकर भी यहां के कृषकों के जमींदारों और अंग्रेजों सरकारों के द्वारा प्रताड़ना की व्यथा सुनाई थी. जो भी कारण रहे हों लेकिन किसी ने इस समस्या को उतना गम्भीर नही माना और अंततः कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में यहां के नीलहे किसानों के प्रति संवेदना जताते हुए एक प्रस्ताव पारित कर के इतिश्री कर ली गई. उसी प्रस्ताव पर बोलते हुए राजकुमार शुक्ला ने कहा “मुझे खुद नही पता है कि यहां आकर आपलोगों को अपनी व्यथा सुनाने के लिए चम्पारण लौटने पर मेरे साथ क्या किया जाएगा”. यही वो अधिवेशन था जहां शुक्ल जी की मुलाकात मोहनदास करमचंद गांधी से हुई जिन्होंने इस मुद्दे पर ये कहकर चुप्पी साध ली थी कि चूंकि वो इस विषय मे ज्यादा कुछ जानते नही हैं इसलिए इस प्रस्ताव पर कुछ नही बोल सकते. लेकिन राजकुमार जी ने प्रसिद्ध पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी जी से गांधीजी के अफ्रीका में किये गए संघर्ष और उसकी सफलता की कहानी सुन रखी थी और वो उनसे खासे प्रभावित थे.

राजकुमार शुक्ल भी हार माननेवालों में से नही थे. अगर वो लखनऊ से सीधा चम्पारण लौट कर बैठ गए होते तो शायद आज भारत का इतिहास कुछ और ही होता लेकिन उन्होंने गांधी के अगले पड़ाव कानपुर तक उनका पीछा करना सही समझा. राजकुमार जी ने गांधीजी से ये कहकर फिर विनती की कि चम्पारण कानपुर से नजदीक ही है लेकिन गांधी ने व्यस्तता का हवाले देकर उनके अनुरोध को फिर से नकार दिया. महात्मा गांधी वहां से अहमदाबाद अपने आश्रम के लिए निकल गए लेकिन वहां पहुंचकर उन्होंने जो देखा वो काफी चकित करने वाला था. गांधीजी के शब्दों में कहें तो “सर्वव्यापी” शुक्ल वहां भी मौजूद थे. आखिरकार गांधीजी ने उन्हें अपने कोलकाता के प्रोग्राम की तारीख बतायी और और वहां आकर उनसे मिलने को कहा. गांधीजी जब कोलकाता पहुंचे तो उन्हें ये जानकर और भी सुखद आश्चर्य हुआ कि राजकुमार जी ने वहां पहले से ही खुद को स्थापित कर रखा था. यही नही, जिन भूपेन बाबू के यहां गांधीजी रुकने वाले थे उनसे भी उन्होंने भी उन्होंने अच्छी जान-पहचान बना ली थी. फिर इन्ही राजकुमार शुक्ल जी ने पटना के लिए टिकट का भी इंतजाम किया वरना गांधीजी को तो ट्रेन का नाम तक नही पता था और उन्होंने सबकुछ शुक्ल जी पर ही छोड़ रखा था. हाँ टिकट जरूर उनके कहे अनुसार तीसरे दर्जे का ही कटाया गया था. वहां से उनलोगों का पटना, फिर मुज़फ़्फ़रपुर में कुछ दिनों का विश्राम  करते हुए मोतिहारी पहुंचना हुआ. इसी चम्पारण सत्याग्रह की वजह से गांधीजी के कुछ आजीवन मित्र बने जैसे कि वकील द्वय डॉ राजेन्द्र प्रसाद और ब्रजकिशोर प्रसाद.
बिहार में निलहे जमींदारों की मनमानी और अंग्रेजों की क्रूरता के अलावे छुआछूत और जात-पात की समस्या ने भी गांधीजी को भीतर तक विचलित कर दिया था. गांधीजी के मोतिहारी पहुंचने और आंदोलन की कहानी तो हमने इतिहास में पढ़ ही है और सर्वविदित है. रह जाता है तो राजकुमार शुक्ल का संघर्ष जिन्होंने लखनऊ से कानपुर से अहमदाबाद से कोलकाता से मोतिहारी तक पूरी जी-जान लगाकर गांधीजी को यहां लाने की कोशिश की और कामयाब हुए. आज यही बिहार है, वही मोतिहारी है और देश के कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह Radha Mohan Singh भी यहीं से हैं और गांधीजी ने जिनके लिए कभी संघर्ष किया, आज वो किसान भी वहीं का वहीं है. बहुत कुछ किया गया है उन किसानों के लिए सरकार द्वारा लेकिन धरातल पर स्थिति वहीं की वहीं है और वो आज भी कर्ज लेकर खेती करने को मजबूर है.

#SatyagrahShatabdiVarsh

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